•हम अपनी तन्हाईयों को जितना पाकीज़ा रखेंगे उतना हम अल्लाह के क़रीब होते जाएंगे।

 

सजग नागरिक टाइम्स :क्या आप जानते हैं के अल्लाह ताला ने हज़राते सहाबा-ए-कराम को एक बार किस तरह इम्तिहान में डाला.. जब के वोह हालत-ए-अहराम में थे, हज-ओ-उमरा की हालत में शिकार की मनाही होती है।

इम्तिहान इस तरह हुआ के शिकार उनके लिए इतने क़रीब पहुंचा दिया के अगर वोह चाहते तो वोह बग़ैर हथियार के भी हाथ से ही शिकार पकड़ सकते थे।

`क़ुरआन में है के *ऐ ईमान वालों अल्लाह तुम्हें शिकार के कुछ जानवरों के ज़रिए ज़रूर आज़माएगा जिनको तुम नैज़ों और हाथ से पकड़ सकोगे, ताके वोह यह देख ले कि कोन है जो उसको देखे बग़ैर भी उससे डरता है, फिर जो शख़्स उसके बाद भी आगे बढ़ेगा वोह दर्दनाक अज़ाब का मुसतहिक़ होगा* (सूरह मायदा: 29)
इस ज़माने में भी ऐसा ही इम्तिहान और आज़माईश का सामना ख़ूब हो रहा है..
वोह क्या और कैसे..?
[metaslider id=2853] `आज से 15/20, साल पहले *फ़हश (vulgar) तस्वीरें और ना’जायज़ वीडियो किलिप्स* वग़ैरह को हासिल करना काफ़ी हद तक मुश्किल हुआ करता था लेकिन आजकल मौबाईल स्क्रीन या कमप्यूटर के बटन को हलका सा टच करने से यह सारे सीन आंखों के सामने आ जाते हैं।
`बे’हयाई और बे’शर्मी को देखना जितना आसान* आज है उतना आसान किसी दौर में नहीं था… *क्या बच्चे क्या बूढ़े और जवान सबके लिए चलती फिरती तस्वीरों के ज़रिए फ़ाहशाई की इस दुनिया में तरह तरह की ज़िना कारी आंखों के सामने आ जाती हैं* वोह भी लगातार… इस लिए आज तसव्वुराती ज़िना में मुलव्विस होना आम होता जा रहा है।
`तंहाई में अपने जिस्मानी आज़ा (Body Parts) की ख़ामोशी और बे’ज़बानी से धोके में ना पड़ो,* इस लिए के एक दिन *इनके बोलने का भी वक़्त आने वाला है।* क़ुरआन में एक मक़ाम पर ज़िक्र है..
*”आज हम इनके मूंह पर मौहर लगा देंगे और इनके हाथ और पैर इनके करतूत की गवाही देंगे”*
`एक बुज़ुर्ग का इरशाद है कि जब कोई आदमी गुनाह में मुबतिला हो, ऐन उस वक़्त हवा के झोंके से दरवाज़े का पर्दा हिलने लगे और उसके *हिलने से आदमी यह समझ कर डर जाए के कोई आ गया तो मेरा यह गुनाह ज़ाहिर हो जाएगा,* यहां वोह इस लिए डर रहा है के कोई इंसान देख ना ले… *मौबाईल या कमप्यूटर पर फ़हश (Vulgar) तस्वीरें या फ़िल्म देखना तो और भी बड़ा गुनाह है* क्यूं के उस शख़्स को मालूम है के *अल्लाह देख रहा है* मगर वोह *अल्लाह से नहीं डरता*

किसी बुज़ुर्ग का क़ौल है के *ज़ाहिर में अल्लाह के दौस्त और पर्दे के पीछे अल्लाह के दुश्मन ना बनो।*

`•एक तरफ़ तो हम यह कहते हैं के *”इस ज़माने में पहले की ब’निसबत हराम कामों तक पहुंचना आसान हो गया है”* वहीं हमें यह भी जान लेना चाहिए के *इस ज़माने में गुनाहों से बचने से अल्लाह का जितना क़ुर्ब हासिल होगा उतना किसी और चीज़ से हासिल नहीं होगा।*
[metaslider id=2853] “•हम अपनी *तन्हाईयों* को जितना *पाकीज़ा* रखेंगे उतना *हम अल्लाह के क़रीब* होते जाएंगे।

मौबाईल फ़ोन एक संदूक़ (Box, बक्सा) है दूसरे लफ़्ज़ों में बैंक लॉकर है इस (मौबाइल) में नैकिया जमा करो या गुनाह, आप इस में जो भी जमा करेंगे कल क़यामत के दिन अपने नाम-ए-आमाल में मौजूद पाएंगे

लेखिका :“अंजली शर्मा 

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