अयोध्या विवाद की सुनवाई को लेकर सुप्रीम कोर्ट में कपिल सिब्बल को मांगनी पड़ी माफी

5 दिसंबर को सुप्रीम कोर्ट में अयोध्या विवाद पर नियमित सुनवाई शुरू होनी थी, लेकिन पहले दिन ही कोर्ट के अंदर ऐसे हालात बने कि तीन सदस्ययी खण्डपीठ को सुनवाई 8 फरवरी तक टालनी पड़ी।
चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा, जस्टिस अशोकभूषण और अब्दुल नजीर की खण्डपीठ ने सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड के वकील कपिल सिब्बल के व्यवहार पर भी नाराजगी जताई। सुनवाई शुरू होते ही सिब्बल ने कहा कि इस मामले की सुनवाई वर्ष 2019 में होने वाले लोकसभा चुनाव के बाद की जाए। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और पूर्व केन्द्रीय मंत्री सिब्बल का कहना रहा कि भाजपा इस मुद्दे का राजनीतिक फायदा उठाएगी।

इस पर खण्डपीठ ने नाराजगी जताई और कहा कि सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई को राजनीति से नहीं जोडऩा चाहिए। इस बीच शिया सेन्ट्रल वक्फ बोर्ड, मुस्लिम पर्सनल ला बोर्ड आदि के वकीलों की वजह से भी सुप्रीम कोर्ट का माहौल गड़बड़ा गया। कोर्ट कोई सख्त टिप्पणी करता, इससे पहले ही कपिल सिब्बल ने खेद प्रकट कर दिया। कोर्ट का कहना रहा कि सभी पक्षों के वकील आपस में तय कर लें कि सुनवाई कैसे होगी?
हालात को देखते हुए कोर्ट ने सुनवाई को 8 फरवरी 2018 तक टाल दिया। कोर्ट ने कहा कि सभी पक्षों को जो भी दस्तावेज जमा कराने हैं, वो 8 फरवरी से पहले-पहले जमा करा दिए जाए। कोर्ट में शिया सेन्ट्रल वक्फ बोर्ड का यह पक्ष भी सामने आया कि अयोध्या में विवादित स्थान पर मंदिर बना दिया जाए और लखनऊ में शिया वक्फ बोर्ड की जमीन पर मस्जिद बनाई जाए। हालांकि इस प्रस्ताव का सुन्नी वक्फ बोर्ड की ओर से कड़ा ऐतराज किया गया। इस पर कोर्ट का कहना रहा कि इस मुद्दे पर दोनों पक्षों में सहमति बननी चाहिए।
शिया बोर्ड को इस विवाद में पक्षकार बनाए जाने पर अभी कोई फैसला नहीं हुआ है। सुनवाई को लेकर जिस तरह सियासी तलवारें खींची, उसको लेकर अब अनेक विवाद खड़े हो गए हैं। टीवी चैनलों पर बहस के दौरान हिन्दू और मुस्लिम नेताओं ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट का फैसला माना जाएगा। लेकिन सवाल उठता है कि यदि सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाई कोर्ट का फैसला बरकरार रखा तो क्या दोनों पक्ष स्वीकार कर लेंगे?

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(यह न्यूज केयर ऑफ मेडिया से लि गयी है)

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